Wednesday, February 17, 2010

shalendraupadhyay

किताबों से
कैसे हो
सुबह से शाम तक
नदी के ऊपर
तपते सूरज की आभा का चित्रण.
कैसे बताएं
सड़क पार से गुज़र जाने के बाद
हमारे पदचिन्हों की पहचान.
कैसे लिखें
कागज़ों पर ढलवां रास्तों की कहानी
मूक शब्दों में.
कैसे चले जाएँ
यही सोचते हुए हम.......?
किताबों से होते हुए.
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Tuesday, February 16, 2010

shalendraupadhyay

क्षण
वह कसन तुम्हें समर्पित हैं
मेरे जीवन
जब में बंद कमरे में बैठा
तुम्ही से बोलता रहता हूँ.
गुनाह मेरे थे ओस क्षण में
अथवा नहीं/
नहीं दोहराना चाहता अब.
फिर भी जब ले जाना चाहता हूँ
स्वयं को, उसी स्तिथि में
याद आ जाता है तब मुझे
मेरे यह क्षण तो
समर्पित कर दिए हैं मैंने तुम्हे.
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Monday, February 15, 2010

shalendraupadhyay

राख
सुबह का सूरज
हिने जा रहा जब अस्त
तभी कहा रूकते हुए उसे
गोधुली के उजाले ने;
वाह!तपा-तपा कर चले जा रहे हो.
सहज आश्चर्य से आतंकित सूरज ने
पिंड छुड़ाने को कहा;
नहीं-नहीं
वह तो मेरा उजाला था,प्रकाश था
अनजानेपन के भ्रम में हो तुम.....
परे हो वास्तविकता से,
टीम;दुपहरी
केवल परछाई को पसंद करती हो.
भयाक्रांत हो कर मुरझा रही हो
न तो तुम आदर्श हो
और न ही शाश्वत सत्य
तुम तो बस
देह विसर्जन के बाद बची राख हो,
यथार्थ तो में हूँ.
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Friday, February 12, 2010

shalendraupadhyay: shalendraupadhyay

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shalendraupadhyay

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समय
क्यों  रहता है कोई सत्य/सचमुच सत्य
यह सवाल मामूली नहीं है
फिर भी हो चला है मामूली/यही सवाल.
सवाल क्यों होता है
जब उत्तरदाता चुप हो
चुप्प ही रहना चाहते हों
धमनियाँ जिनकी जर्जर हों
उस युग के उन पुरूषों से सवाल है.

नपुंसकों की भीड़ में आदमी होना खतरनाक है
आदमी बेचारा होता है
सब-कुछ सहने को
सब-कुछ ओढने को
जैसे पहली बारिश  में मिट्टी की दीवार हो
और आखिर तक भी पत्थरों से आगे रहे.
कहीं कंदीलों की मद्धिम रोशनी में
कोई कविता लिखना चाहता है
और वह भी नहीं सुहाता
कुलबुले कड़ाके को;
कंदील बुझ-बुझ जाता है
अपने होने का अहसास-
अपने अस्तित्व का भान 
अपने तैंईं ही रहता है,
फिर चिंहुक उठते हैं
चाण्डाल झिंगुर/पिशाच प्रहसन
और कर देते हैं सब-कुछ तहस-नहस
किसी का अस्तित्व/किसी का सत्य/किसी का अपनापन.

वह मौन है
मरीत्युशैया से माहीघाट सरीखा!
रेत के धोरों की मानिंद
पत्थरों  की बस्ती में रहकर भी
नहीं हो सका पत्थर.
उसने कभी नहीं बनाये
संबंधों के समीकरण;
जोड़-बाकी,गुणा-हल
कुछ भी तो नहीं.
वह शिव ही रहा.
विषपान करके भी नहीं मरते हैं शिव
गूंजता है शिवत्व का डमरू
तनती हैं भ्रकुटियाँ
और भीग उठता है भू-मण्डल
कब होगा ताण्डव फिर से
कि खुल जाये त्रिनैत्र शिव का
यही तो है सवाल
जो है सबसे.

श्मशान में राख बचती है
चलो चलें श्मशान
मुट्ठी भर राख ले करें फिर कोई प्रण
उसी राख से जो है पवित्र (कहलाती है भस्मी पवित्र )
संहार करने का.
विनाश नहीं जिसकी गति
करें तर्पण युगों-युगों के लिए
ताकि देख ले समय.
मामूली नहीं है सवाल यह
शिव के ही सवाल हैं ये
जो हैं समय से
जो हैं सवालों के चक्रव्यूह से
और मूक दर्शकों से.
देखें; समय है सत्य
या कि सत्य से दूर समय.
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