Monday, February 22, 2010

shalendraupadhyay

काग़ज़ की नाव  
कैसे बनती हैं
कागज़ों की नावें ?
पता नहीं !
लेकिन पता है, मुझे
सदियों से / सदियों की बात
जब पुरखे भी मेरे हमशक्ल ही थे ;
कभी नहीं तैर पाई थीं
गंतव्य तक
कागज़ी नावें !
आखिर पता तो चले
कहाँ चला जाता है
माथे से टपका पसीना
बूंद , बूंद , बूंद..........
.........और न जाने कितनी ही बूंदे .
कभी-कभी
यह ज़रूर ही पता लगता है
कि बनेगा एक सागर
इन बूंदों   का
और डूब जायेंगें हम
लेकिन नहीं तैरेगी
कागज़ की नाव.
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Sunday, February 21, 2010

shalendraupadhyay

उम्मीद
उम्मीद -दर-उम्मीद आदत
मिलती है कभी-कभी
सूनेपन के गलियारे में
जब ढलने को आती है शाम
सूरज बूढ़ा हो चलता है
और
मनुष्य बौना हो चुकता है
आदत का दरवाज़ा  खटखटाते- खटखटाते .
मरते-जीते हैं
कविता के शब्द
लेकिन बनी रहती है
उम्मीद
केशों के श्वेत होने तक
गिनते रहने की
काया के कृशकाय होने तक
सहेजने  की.
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Saturday, February 20, 2010

shalendraupadhyay

खंडहर
वैसी ही/वही आवाज़ें
आती रहती हैं
खंडहरों से
जैसे सांसों से आती आहें.
टकराती हैं दीवारें
खंडहरों की
जैसे इंसान की मानसिकता.
खंडहरों से आती आवाज़ें
और टकराहट उनकी
सीमित है अपने आप में ही
लेकिन आगे हैं उससे भी
इंसानी मनोभाव,
ख़त्म करने को इंसानियत.
फिर कैसे हो?
उनका मिलन.
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Thursday, February 18, 2010

shalendraupadhyay

लगातार
बहते जाना सीधे ही
नदी के पानी का
लगातार/
भागते जाना इधर-से-उधर
परिवेश की हवा का
लगातार/
फेंकते रहना अनवरत
सूरज का किरणों को
लगातार/
..................
कितना ही नीरस-सा क्यों न हो
ज़रूर ही रहता होगा
कोई आदत/रुचिकर चर्या
नदी का पानी,
हवा का रुख
और सूरज की किरणें
कैसे बन जाएँ
आदत/रुचिकर
हमारी छोटे-छोटे कदमों वाली
जरा सी ज़िंदगी में
बन जाएँ पर्याय शायद ही
अपने साथ रोज़  ही
घिसटती अँगुलियों लगी तलवों की आकृति को जबरन खींचकर.
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Wednesday, February 17, 2010

shalendraupadhyay: shalendraupadhyay

shalendraupadhyay: shalendraupadhyay

shalendraupadhyay

किताबों से
कैसे हो
सुबह से शाम तक
नदी के ऊपर
तपते सूरज की आभा का चित्रण.
कैसे बताएं
सड़क पार से गुज़र जाने के बाद
हमारे पदचिन्हों की पहचान.
कैसे लिखें
कागज़ों पर ढलवां रास्तों की कहानी
मूक शब्दों में.
कैसे चले जाएँ
यही सोचते हुए हम.......?
किताबों से होते हुए.
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Tuesday, February 16, 2010

shalendraupadhyay

क्षण
वह कसन तुम्हें समर्पित हैं
मेरे जीवन
जब में बंद कमरे में बैठा
तुम्ही से बोलता रहता हूँ.
गुनाह मेरे थे ओस क्षण में
अथवा नहीं/
नहीं दोहराना चाहता अब.
फिर भी जब ले जाना चाहता हूँ
स्वयं को, उसी स्तिथि में
याद आ जाता है तब मुझे
मेरे यह क्षण तो
समर्पित कर दिए हैं मैंने तुम्हे.
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