Wednesday, March 10, 2010

shalendraupadhyay

   संबंधों की तलाश  
छू गई सर्द हवा मेरे तन-मन को
और सिमट गया माटी का ढांचा
हथियारों की तरह किटकिटाने लगे दांत
संबंधों की तरह कांपने लगी काया
और अंत में;
मैं मर गया.

कुछ भी कह लो
कैसे जी सकते हैं हम
इस तरह कि_दिन भर मरते रहे.

मैं तो मर नहीं सकता
मन को छोड़कर
और जी भी नहीं सकता
सिर्फ तन को लेकर.

फिर चल पड़ता हूँ
मन को तन से जोड़ने वाले
संबंधों की तलाश में.
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Thursday, March 4, 2010

shalendraupadhyay

पलायन
बहकते-बहकते याद आ जाती है
समय के परिवर्तन की परिभाषा
और-तब
बहकना छोड़कर
झकझोरता हूँ जालों को
परिभाषाओं के.

फिर मैं
निष्कर्ष पाता हूँ
कि परिभाषाओं का आपस में घुट जाना
बहकने के बराबर ही होता है.

फिर भी
यह तो चिन्हीत हो ही जाता है
कि नहीं है यह पलायन.

बस बहकता  ही तो है
शायद मैं संवर जाऊं !

Tuesday, March 2, 2010

shalendraupadhyay

हवा चली गई
और मैं बहता गया
मेरे घर के पास की
हवा में
कि-शायद
मैं हो जाऊं आभामंडल .

हवा रुक गई
मैं सिमट गया
फिर रह गई एक बात मेरे साथ
मेरा मन आभामण्डल ही रहा/
प्राकृत संकुचित हो गया.

सहसा पुनः चल पडी हवा;
मैं पड़ा रहा कमरे में
खुद के पास.

हवा चली गई
और
जीता रहा मैं
अपने वर्तमान में
समय के सानिंध्य में.

Sunday, February 28, 2010

shalendraupadhyay: shalendraupadhyay

shalendraupadhyay: shalendraupadhyay

shalendraupadhyay

नामकरण
कहीं-न-कहीं
कभी-न-कभी
मिलती ही हैं दिशाएँ
फिर क्यों होता है
संकोच !

संकोच तिरोहित कर देता है
संभावनाओं की विपुलताओं को
होता है तब भी , क्यों
संकोच !!

न दें हम कोई परिभाषा
दिशाओं के दशावतारों को,
संवादों की सहयात्रा को.
परिभाषाओं की प्रक्रियाएं 
करती है कोई नामकरण
ओर हो जाता है
विवादों का जन्म.

हम हों शिशु
बकरियों के पीछे भागते,
निम्बोलियाँ चाटते 
कंचे उछालते
कि और भी सहज, सहजतर
कि भूल जाएँ किसी सीमा को
अपनी सीमाओं के भीतर-बाहर !

सच यही तो याद रहती हैं
वो स्मृतियाँ !
बातें होती थी बड़े-बूढों की
और हम थे निरे बच्चे 
एक छोटे से शहर में
(महानगरीय ज़िन्दगी की कालोनी से भी छोटे)
और होती थी  सम्पत्ति हमारी
बकरियां, कंचे ,आम्बागोटी , जंगल जलेबी
इमली के बीज , सतोलिया के पत्थर और राड
या फिर दाजी की डाट
भूरी काकी की तरेरती आँखे
इंजेक्शन वाले मामा की दहशत,
                      .................................!

बस यही सब तो
फिर सच तो यही है न
अब न रहे वो सब
और न ही हम बच्चे रहे.
बस टीस-भर बालपने की.

समय का हो स्पंदन , यों ही
और हो किसी अंजुमन का अहसास,
हम अकेले रखें , संवादों , संबोधनों के मायाजाल से
और हों_सहयात्री सहज संजीवन के
कि हो एक अनुष्ठान;
समस्त अनुष्ठानों के अंतस से.
ओ, सखी !यही हो;_बस न हो कोई नामकरण. 
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Saturday, February 27, 2010

shalendraupadhyay

सूर्य 
मेरे यहाँ बसती हैं 
उम्र भर की रोशनियाँ
कंदीलों की छाया
बहक जाती है
इन रोशनियों में घूलते-मिलते.
तब बनता है
एक नया आभामण्डल
सारे सूर्य की रोशनी का.
मेरे यहाँ की रोशनी
विस्तृत हो कर
मुझ में सिमट जाती है
और मैं ; बन जाता हूँ सूर्य.
मेरा सूर्य/मैं
विगत को ठेलकर
एक आकार बन जाते हैं
चंहु ओर
              रोशनियाँ देने को.
और
मैं/सूर्य.......
जीता जाता हूँ
उम्र भर की रोशनियों से
उर्जा लेकर.......
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Thursday, February 25, 2010

shalendraupadhyay

प्रहसन
राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत्य है !
गूंजता है, यही घोष
मेरी शिराओं में.

शिराएँ, जो सहज नहीं रहीं
शिराएँ, जो सहेजी नहीं गई
शिराएँ, जो अब जीवित भी नहीं
फिर भी हैं शिराएँ !

अपने होने का अहसास
अपने न होने की कल्पना
कितनी करीब है, कालशिराओं से
कि हर बार जी उठता हूँ, मर-मर कर !

अहम् ब्रह्मास्मि 
तज दिया यह चिंतन
कि समय नहीं है मेरा
मैं,जो जय-अजय का पुंज नहीं
जो यश-अपयश का सार नहीं
हूँ, केवल एक गति.

अस्तित्व का अटूट होना-नियति/
आह्ट-दर-आह्ट 
कि  मृत्यु पराजित हो जाती है
अपने पंजों के विस्तार के बाद भी
क्यों गति मेरी !

चलो, छेड़ें कोई और प्रहसन 
कि चहुँ ओर से हो कोई गूँज
छंट जाए मन का घटाघोप 
और
हो सखी के भीगे केशों का स्पर्श
कि खो जाएँ हथेली में बिछी रेखाएं.