Friday, March 19, 2010

shalendraupadhyay

मैं सन्दर्भ हूँ
तख्तियाँ मत टांगो
घर कहीं खो नहीं जाएगा.

हवा का रुख
सूरज की रोशनी
धरती की सतह
किसी की बपोइती  नहीं होती.

शब्दकोष फट जाएँ
और आँखों में उतर आए खून !
किसी अजनबी से मिलकर
बचपन का रोना याद जाए !!

मधुशाला से लौटी स्मृति
गली के आखिर में बना घर
गंदे कागज़ पर छपी इबारत
नहीं हो सकती मेरी परिभाषाएं.

मैं समय नहीं 
मैं स्थिर नहीं
मैं परम्परा नहीं
सन्दर्भ हूँ मैं.

अनचीन्हे आशियाने
नहीं होते किसी भी तरह के ठहराव !
पंछी-तुम न उड़ो
                        इस शहर से.
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Tuesday, March 16, 2010

shalendraupadhyay

शव
दरवाज़े पर दस्तक होती है
जब भी जाता है कोई शव मेरी गली से
चलो-तुम्हारा भी काल आ गया.

मैं, शव, गली और दरवाज़ा !
क्यों जुड़े हैं आपस में इस तरह
सोचता रहा जाता हूँ देर रात तक
और  आ जाती है चुपके से नींद.
नींद तनाव को ढीला करती होगी/
                      होगी विश्राम देती
किसी और के लिए
बडबडाता हूँ मैं तो नींद में/
                 उन्नीन्दें सपनों की भरमार से.
और उचट जाती है नींद !

नींद में देखे सपने
क्या होते हैं किसी की घटनाएं ?
                 दोपहर भर का मायाजाल-?
मुझे नहीं पता.
मैं तो तनाव को ही भोगता हूँ
तुम्हारी स्मृति भी आती है बीच-बीच में
और मीठी हो जाती है नींद.
मैं, नींद और तुम्हारी स्मृति
सभी तो एक समीकरण हैं/
                  गणित के ही नहीं
जो नहीं हो सकते हल/
                     कभी-भी 
अकेले-अकेले.

सत्य में भी तुम्हें ही ढूँढता हूँ/
                 जब सब होता है सामान्य
ताकि शव देखते समय
मुझे देखो तुम
और कर सको हल, गणित
मेरे सपनों का, मेरे तनावों का.

नहीं झुठलाता सच को/
       .......................मैं;
क्योंकि एक शव ही हूँ मैं भी
                 .................शव
जीवित ही सही.
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Monday, March 15, 2010

shalendraupadhyay: shalendraupadhyay

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shalendraupadhyay

संबोधन मत बदलो
मिट्टी के महल नहीं बनते
जीवन मिट्टी है.

बंजारे घर बाँधकर
नहीं बैठते एक ठौर.

कभी नहीं बुन सकते, हवा में ताने-बाने
मिट्टी और घर को छोड़कर .
हवा में उड़े तिनकों का ढेर भी
नहीं टिकता.
और हवा नियति है/ घर प्रकृति
मैं तो तिनका भर.

मैं नियति नहीं हूँ तुम्हारी
मत बदलो संबोधन बार-बार
संबोधन बदलने से नहीं टिकते हैं सम्बन्ध.
मैं शाश्वत तलाशूँ
और तुम रचो परिभाषाएं बार-बार.

लोट आओ तुम धरातल पर
मैं या तो धरातल हूँ
या शून्य.

टूटने से अच्छा है
सम्बन्धों की दिशाएँ बदल लें.

जाओ तुम कहीं ओर
दिशाओं के बिखरने से पहले.
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Friday, March 12, 2010

shalendraupadhyay

चिड़िया और चींटी के नाम  
जब भी कहा है मैंने
चिड़ियों से उड़ने को
चींटियों से चलने को
और मेरे साथ
मेरे घर तक आने को
तब-तब हंसी उड़ाई उन्होंने
मेरे आमंत्रण पर.
चिड़िया चहक-चहक कर कहती है_
चले जाओ हमारे पास से.

बहुत पूछा मैंने उनसे
रूठने का कारण
लेकिन हर बार मिली चुप्पी ही
उनके चेहरों पर.

मैंने भी तय किया
किसी जन्म में, मैं भी बनूंगा
चिड़िया या चींटी
ताकि बचा रहूँ
...................बाहरी बुलावों से
और घूम सकूं
            .......स्वछंद
हर आमंत्रण से निर्विकार.
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Wednesday, March 10, 2010

shalendraupadhyay: shalendraupadhyay

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shalendraupadhyay

   संबंधों की तलाश  
छू गई सर्द हवा मेरे तन-मन को
और सिमट गया माटी का ढांचा
हथियारों की तरह किटकिटाने लगे दांत
संबंधों की तरह कांपने लगी काया
और अंत में;
मैं मर गया.

कुछ भी कह लो
कैसे जी सकते हैं हम
इस तरह कि_दिन भर मरते रहे.

मैं तो मर नहीं सकता
मन को छोड़कर
और जी भी नहीं सकता
सिर्फ तन को लेकर.

फिर चल पड़ता हूँ
मन को तन से जोड़ने वाले
संबंधों की तलाश में.
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